[2021] Best Mirza Ghalib Shayari in Hindi:- की इस खास Post में पढ़ेंगे मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी, (Mirza Ghalib Shayari on Love), Mirza Ghalib Shayari In Hindi 2 Lines, को जो आप के Dil छू जाएँगी। आशा करता हूँ की यह पोस्ट आप सभी शेर-ओ-शायरी के चाहने वालो को पसंद आएगी।

दोस्तों जहा भी Sher-o-Shayari का ज़िक्र जहा होता वहा सबसे पहले नाम महान शायर Mirza Ghalib का आता हैं. ग़ालिब उर्दू शायरी का वह चमकता सितारा हैं जो आज भी आकाश के चमचमाते तारे की तरह चमक रहा।

6महान शायर Mirza Ghalib को कौन नहीं जानता, अपने इंतकाल के 150 वर्ष बाद, आज भी Ghalib भारत के सबसे प्रसिद्ध शायर हैं, Ghalib Shayari आज भी बच्चे बच्चे की जुबान पर है, वेसे तो Mirza Ghalib आखिरी मुग़ल सुल्तान बहादुर शाह ज़फर के दरबारी शायर थे पर ग़ालिब और Ghalib ki Shayari उनके जीवन कल में और आज तक आम जनता में खूब शौक से पढ़े जाते हैं. Mirza Ghalib shayari in Hindi 2021, उर्दू और फारसी ज़बान में है, शुरू में मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर बहुत मुश्किल हुआ करते थे और वह विद्वानों के भी समझ में नहीं आते थे पर बाद में मिर्ज़ा ग़ालिब ने आम फहम ज़बान में शायरी की और बहुत लोकप्रिय शायर हो गए, Mirza Ghalib shayari On Love, दर्द, जुदाई, sad Shayari, इश्क, मय शराब, खुदी, खुदा, रूह सबका बेहतरीन ज़िक्र मिलता है.

Best Mirza Ghalib Shayari in Hindi 2021

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Mirza Ghalib Shayari in Hindi 2021

इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब,
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।
Ishq Par Jor Nahi Hai Ye Wo Aatish Galib,
Ki Lagaye Na Lage Aur Bujhaye Na Bujhe.

चाँदनी रात के खामोश सितारों की कसम,
दिल में अब तेरे सिवा कोई भी आबाद नहीं।
Chaandni Raat Ke Khamosh Sitaron Ki Kasam,
Dil Mein Ab Tere Siwa Koyi Bhi Aabaad Nahi.

आता है दाग-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद,
मुझसे मेरे गुनाह का हिसाब ऐ खुदा न माँग।
Aata Hai Daag-e-Hasrat-e-Dil Ka Shumaar Yaad,
Mujhse Mere Gunaah Ka Hisaab Ai Khudaa Na Maang.

ता फिर न इंतज़ार में नींद आये उम्र भर,
आने का अहद कर गये आये जो ख्वाब में।
Ta Fir Na Intezaar Mein Neend Aaye Umr Bhar,
Aane Ka Ahed Kar Gaye Aaye Jo Khwaab Mein.

दिल गंवारा नहीं करता शिकस्ते-उम्मीद,
हर तगाफुल पे नवाजिश का गुमां होता है।
Dil Ganwara Nahi Karta Shikast-e-Ummeed,
Har Tagaful Pe Nawajish Ka Gumaan Hota Hai.

ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे,
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे?
Ghalib Bura Na Maan Jo Waaiz Bura Kahe,
Aisa Bhi Koi Hai Ke Sab Achha Kahein Jisse?

ज़िन्दगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री,
हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे।
Zindagi Apni Jab Iss Shakl Se Gujri,
Hum Bhi Kya Yaad Karenge Ki Khuda Rakhte The.

आया है बेकसी-ए-इश्क पे रोना ग़ालिब,
किसके घर जायेगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद।
Aaya Hai BeKasi-e-Ishq Pe Rona Ghalib,
Kiske Ghar Jayega Sailab-e-Bala Mere Baad.

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना,
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।
Ishrat-e-Qatra Hai Dariya Mein Fanaa Ho Jana,
Dard Ka Hadd Se Gujarna Hai Dawa Ho Jana.

इश्क से तबियत ने जीस्त का मजा पाया,
दर्द की दवा पाई दर्द बे-दवा पाया।
Ishq Se Tabiyat Ne Zeest Ka Mazaa Paya,
Dard Ki Dawa Payi Dard Be Dawa Paya.

तुम न आओगे तो मरने की हैं सौ तदबीरें,
मौत कुछ तुम तो नहीं है कि बुला भी न सकूं।
Tum Na Aaoge To Marne Ki Hai Sau Tadbeerein,
Maut Kuchh Tum To Nahi Hai Ki Bula Bhi Na Saku.

आईना देख के अपना सा मुँह लेके रह गए,
साहब को दिल न देने पे कितना गुरूर था।
Aaina Dekh Apna Sa Moonh Le Ke Reh Gaye,
Sahab Ko Dil Na Dene Pe Kitna Guroor Tha.

उनके देखने से जो आ जाती है चेहरे पर रौनक,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
Unke Dekhe Se Jo Aa Jaati Hai Chehre Par Raunaq,
Wo Samajhte Hain Ke Beemaar Ka Haal Achchha Hai.

ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
Ye Na Thi Humari Kismat Ki Visaal-e-Yaar Hota,
Agar Aur Jeete Rehte, Yehi Intezaar Hota.

आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक।
Aashiqi Sabr Talab Aur Tamanna Betab,
Dil Ka Kya Rang Karoon Khoon-e-Jigar Hone Tak.

हम महव-ए-चश्म-ए-रंगीं-ए-जवाब* हुए हैं,
जबसे शौक़-ए-दीदार हुआ जाता है हर सवाल का रंग !!
ham mahav-e-chashm-e-rangeen-e-javaab* hue hain,
Jabase, shauq-e-deedaar hua jaata hai har savaal ka rang !!

जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की,
लिख दीजियो या रब उसे क़िस्मत में अदू की !!
jis zakhm kee ho sakate ho tadabeer rafu kee, likh deejiyo ya rab use qismat mein adu kee !!

Mirza Ghalib shayari on love

हर रंज में ख़ुशी की थी उम्मीद बरक़रार,
तुम मुस्कुरा दिए मेरे ज़माने बन गये !!
har ranj men khushi ki thi ummid baraqaraar, tum muskura diye mere zamaane ban gaye !!

नसीहत के कुतुब-ख़ाने* यूँ तो दुनिया में भरे हैं,
ठोकरें खा के ही अक्सर बंदे को अक़्ल आई है !!
nasihat ke kutub-khaane* yun to duniya mein bhare hain,
Thokaren kha ke hee aksar bande ko aql aai hai!!

ये फ़ित्ना आदमी की ख़ाना-वीरानी को क्या कम है,
हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उस का आसमाँ क्यूँ ह
ye fitna admi ki khana-viraane ko kya kam hai,
hue tum dost jis ke dushman us ka asamaan kyoon ho !!

कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
koi mere dil se puchhe tire tir-e-nim-kash ko,
ye khalish kahaan se hotee jo jigar ke paar hota !!

ता फिर न इंतिज़ार में नींद आए उम्र भर,
आने का अहद कर गए आए जो ख़्वाब में !!
ta phir na intizaar mein neend aae umr bhar, aane ka ahad kar gae aae jo khvaab mein !!

क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं,
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ?
qaid-e-hayat o band-e-gam asl men donon ek hain,
maut se pahale Adami gam se najaat pae kyun?

इन आबलों से पाँव के घबरा गया था मैं,
जी ख़ुश हुआ है राह को पुर-ख़ार देख कर !!
in aabalon se panv ke ghabara gaya tha main,
Ju khush hua hai raah ko pur-khaar dekh kar !!

‏मुहब्बत में उनकी अना का पास रखते हैं,
हम जानकर अक्सर उन्हें नाराज़ रखते हैं !!
‏muhabbat mein unki ana ka paas rakhate hain,
ham jaanakar aksar unhen naaraaz rakhate hain !!

Best Mirza Ghalib Shayari in Hindi 2 Lines

Mirza Ghalib Shayari in hindi 2 lines
Mirza Ghalib Shayari in hindi 2 lines

आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गर्मी कहाँ
सोज़-ए-ग़म-हा-ए-निहानी और है

अब जफ़ा से भी हैं महरूम हम अल्लाह अल्लाह
इस क़दर दुश्मन-ए-अरबाब-ए-वफ़ा हो जाना

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम
मजनूँ को बुरा कहती है लैला मिरे आगे

कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता

कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तू ने हम-नशीं
इक तीर मेरे सीने में मारा कि हाए हाए

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

आ ही जाता वो राह पर ‘ग़ालिब’
कोई दिन और भी जिए होते

और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया
साग़र-ए-जम से मिरा जाम-ए-सिफ़ाल अच्छा है

इब्न-ए-मरयम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दवा करे कोई

ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे

एक हंगामे पे मौक़ूफ़ है घर की रौनक़
नौहा-ए-ग़म ही सही नग़्मा-ए-शादी न सही

ए’तिबार-ए-इश्क़ की ख़ाना-ख़राबी देखना
ग़ैर ने की आह लेकिन वो ख़फ़ा मुझ पर हुआ

इक ख़ूँ-चकाँ कफ़न में करोड़ों बनाओ हैं
पड़ती है आँख तेरे शहीदों पे हूर की

इन आबलों से पाँव के घबरा गया था मैं
जी ख़ुश हुआ है राह को पुर-ख़ार देख कर

एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
ख़ून-ए-जिगर वदीअत-ए-मिज़्गान-ए-यार था

Mirza Ghalib Sad Shayari in hindi font

क़त्अ कीजे न तअ’ल्लुक़ हम से
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही

क़तरा अपना भी हक़ीक़त में है दरिया लेकिन
हम को तक़लीद-ए-तुनुक-ज़र्फ़ी-ए-मंसूर नहीं

कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग
हम को जीने की भी उम्मीद नहीं

कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्ना
है यूँ कि मुझे दुर्द-ए-तह-ए-जाम बहुत है

आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना ‘ग़ालिब’
किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बअ’द

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

आँख की तस्वीर सर-नामे पे खींची है कि ता
तुझ पे खुल जावे कि इस को हसरत-ए-दीदार है

आज हम अपनी परेशानी-ए-ख़ातिर उन से
कहने जाते तो हैं पर देखिए क्या कहते हैं

उधर वो बद-गुमानी है इधर ये ना-तवानी है
न पूछा जाए है उस से न बोला जाए है मुझ से

उम्र भर का तू ने पैमान-ए-वफ़ा बाँधा तो क्या
उम्र को भी तो नहीं है पाएदारी हाए हाए

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

तुम सलामत रहो हजार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हजार

Mirza Ghalib 2 Line Shayari 

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

अदा-ए-ख़ास से ‘ग़ालिब’ हुआ है नुक्ता-सरा
सला-ए-आम है यारान-ए-नुक्ता-दाँ के लिए

इस नज़ाकत का बुरा हो वो भले हैं तो क्या
हाथ आवें तो उन्हें हाथ लगाए न बने

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

कुछ तो पढ़िए कि लोग कहते हैं
आज ‘ग़ालिब’ ग़ज़ल-सरा न हुआ

क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ

अगले वक़्तों के हैं ये लोग इन्हें कुछ न कहो
जो मय ओ नग़्मा को अंदोह-रुबा कहते हैं

अपना नहीं ये शेवा कि आराम से बैठें
उस दर पे नहीं बार तो का’बे ही को हो आए

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

उस अंजुमन-ए-नाज़ की क्या बात है ‘ग़ालिब’
हम भी गए वाँ और तिरी तक़दीर को रो आए

अपनी हस्ती ही से हो जो कुछ हो
आगही गर नहीं ग़फ़लत ही सही

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यूँ तेरा घर मिले

अल्लाह रे ज़ौक़-ए-दश्त-नवर्दी कि बाद-ए-मर्ग
हिलते हैं ख़ुद-ब-ख़ुद मिरे अंदर कफ़न के पाँव

इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही

इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

अगर ग़फ़लत से बाज़ आया जफ़ा की
तलाफ़ी की भी ज़ालिम ने तो क्या की

आज वाँ तेग़ ओ कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र मेरे क़त्ल करने में वो अब लावेंगे क्या

काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुम को मगर नहीं आती

काफ़ी है निशानी तिरा छल्ले का न देना
ख़ाली मुझे दिखला के ब-वक़्त-ए-सफ़र अंगुश्त

Heart Touching Mirza Ghalib Shayari in hindi 2 lines

आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
मुझ से मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग

उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ
शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ जुरअत-ए-रिंदाना चाहिए

काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई न पूछ
सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का

कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाए है मुझ से
जफ़ाएँ कर के अपनी याद शरमा जाए है मुझ से

काँटों की ज़बाँ सूख गई प्यास से या रब
इक आबला-पा वादी-ए-पुर-ख़ार में आवे

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया

आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में
‘ग़ालिब’ सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

कब वो सुनता है कहानी मेरी
और फिर वो भी ज़बानी मेरी

कह सके कौन कि ये जल्वागरी किस की है
पर्दा छोड़ा है वो उस ने कि उठाए न बने

कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए
मुद्दआ अन्क़ा है अपने आलम-ए-तक़रीर का

चाहें ख़ाक में मिला भी दे किसी याद सा भुला भी दे,
महकेंगे हसरतों के नक़्श* हो हो कर पाएमाल भी !!

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा

जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन,
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए !!

फिर देखिए अंदाज़-ए-गुल-अफ़्शानी-ए-गुफ़्तार,
रख दे कोई पैमाना-ए-सहबा मिरे आगे !!

क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ,
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में !!

है एक तीर जिस में दोनों छिदे पड़े हैं
वो दिन गए कि अपना दिल से जिगर जुदा था

न सुनो गर बुरा कहे कोई,
न कहो गर बुरा करे कोई !!
रोक लो गर ग़लत चले कोई,
बख़्श दो गर ख़ता करे कोई !!

तेरे वादे पर जिये हम
तो यह जान,झूठ जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते
अगर एतबार होता ..
गा़लिब

तुम अपने शिकवे की बातें
न खोद खोद के पूछो
हज़र करो मिरे दिल से
कि उस में आग दबी है..
गा़लिब

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं
गा़लिब

अपनी गली में मुझ को
न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को
क्यूँ तेरा घर मिले
गा़लिब

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

कुछ लम्हे हमने ख़र्च किए थे मिले नही,
सारा हिसाब जोड़ के सिरहाने रख लिया !!

भीगी हुई सी रात में जब याद जल उठी,
बादल सा इक निचोड़ के सिरहाने रख लिया !!

अब अगले मौसमों में यही काम आएगा,
कुछ रोज़ दर्द ओढ़ के सिरहाने रख लिया !!

वो रास्ते जिन पे कोई सिलवट ना पड़ सकी,
उन रास्तों को मोड़ के सिरहाने रख लिया !!

अफ़साना आधा छोड़ के सिरहाने रख लिया,
ख़्वाहिश का वर्क़ मोड़ के सिरहाने रख लिया !!

तमीज़-ए-ज़िश्ती-ओ-नेकी में लाख बातें हैं,
ब-अक्स-ए-आइना यक-फ़र्द-ए-सादा रखते हैं !!

ज़रा कर ज़ोर सीने में कि तीरे-पुर-सितम निकले,
जो वो निकले तो दिल निकले

जो दिल निकले तो दम निकले !!

रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं !!

हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है !!
जान तुम पर निसार करता हूँ,
मैं नहीं जानता दुआ क्या है !!


पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वाँ कोई न हो

हसद से दिल अगर अफ़्सुर्दा है गर्म-ए-तमाशा हो
कि चश्म-ए-तंग शायद कसरत-ए-नज़्ज़ारा से वा हो

हम तो जाने कब से हैं आवारा-ए-ज़ुल्मत मगर,
तुम ठहर जाओ तो पल भर में गुज़र जाएगी रात !!

है उफ़ुक़ से एक संग-ए-आफ़्ताब आने की देर,
टूट कर मानिंद-ए-आईना बिखर जाएगी रात !!

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाए क्यूँ

हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

Bas ki dushwaar hai har kaam ka aasaan hona
Aadami ko bhi mayssar nahin insaan hona

Mirza Ghalib Shayari in Hindi 2 Lines

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से जनता को क्यूँ तेरा घर मिले

Apni gali mein mujh ko na kar dafn baad-e-qatl
Mere pate se khlk ko kyun tera ghar mile

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

Aaina kyun na dun ki tamaasha kahein jise
Aisa kahan se laaun ki tujh sa kahein jise

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर* होते तक

सर = सुलझाना

Aah ko chahiye ik umar asar hote tak
Kaun jeeta hain teri julf ke sar hote tak

आज हम अपनी परेशानी-ए-ख़ातिर उन से
कहने जाते तो हैं पर देखिए क्या कहते हैं

Aaj ham apni pareshani-e-khatir un se
Kehane jaate to hain par dekhiye kya kehate hain

आज वाँ तेग़* ओ कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र* मेरे क़त्ल करने में वो अब लावेंगे क्या

तेग = तलवार, उज्र = दलील, क्षमा

Aaj wahan teg o kafan baandhe hue jaata hun mein
Urj mere qatl karne mein wo ab laavenge kya

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था

Aaina dekh apna sa munh le ke rah gaye
Sahab ko dil na dene pe kitana gurur tha

बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ‘ग़ालिब’
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं

Bana kar faqiron ka ham bhes ‘Ghalib’
Tamaasha-e-ahal-e-karam dekhte hain

आए है बे-कसी-ए-इश्क़ पे रोना ‘ग़ालिब’
किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद

Aaye hain be-kasi-e-ishq pe rona Ghalib
Kis ke ghar jaayega sailaab-e-bala mere baad

बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह
जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है

बोसा = चुम्बन

Best Shayari of mirza ghalib in hindi

Bosa dete nahin aur dil pe hai har lahaza nigaah
Jee mein kehate hai ki muft aaye to maal achha hai

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार* होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

* विसाल-ए-यार = प्रेमी से मिलन

Ye na thi hamari kismat ki visaal-e-yaar hota
Agar aur jeete rehate yahi intizaar hota

छोड़ा न रश्क* ने कि तिरे घर का नाम लूँ
हर इक से पूछता हूँ कि जाऊँ किधर को मैं

Chhoda na rashq ne ki tire ghar ka naam lun
Har ik se poonchhata hun ki jaaun kidhar ko main

दाइम* पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं
ख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं

* दाइम = अन्नत

Daaim pada hua tire dar par nahin hun main
Khaak aisi zindagi pe ki pathar nahin hun main

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

Dil-e-nadaan tujhe hua kya hai
Aakhir is dard ki dawa kya hai

ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइज़* बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे

* वाइज़ = धर्म उपदेशक

Ghalib bura na maan jo waaiz bura kahe
Aisa bhi koi hai ki sab achha kahein jise

हाए उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत ‘ग़ालिब’
जिस की क़िस्मत में हो आशिक़ का गिरेबाँ होना

Haaye us chaar girah kapde ki kismat Ghalib
Jis ki kismat mein ho aashiq ka girebaan hona

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

Hain aur bhi duniya mein sukhan-war bahut achchhe
Kehate hain ki Ghalib ka hai andaaz-e-bayan aur

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

Ham ko un se wafa ki hai ummeed
Jo nahin jaante wafa kya hai

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है

Har ek baat pe kehate ho tum ki tu kya hai
Tumhi kaho ki ye andaaz-e-guftugoo kya hai

बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल
कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का
ख़ंदा-हा-ए-गुल = फूलों की हंसी

Bulbul ke karobaar pe hain khanda-ha-e-gul
Kehate hain jis ko ishq khalal hain dimaag ka

तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए’तिबार होता

Tire waade par jiye ham to ye jaan jhut jaana
Ki khushi se mar na jaate agar etibaar hota

रेख़्ते* के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था

* रेख्ते = उर्दू भाषा का पुराना नाम

Rekhte ke umhin ustaad nahin ho ‘Ghalib’
Kehate hai agale zamaane mein koi ‘Meer’ bhi tha

Mirza Ghalib Shayari in English 2 lines

रोने से और इश्क़ में बे-बाक हो गए
धोए गए हम इतने कि बस पाक हो गए

Rone se aur ishq mein be-baak ho gaye
Dhoye gaye ham itne ki bas paak ho gaye

दुःख से आदि हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं

Ranz se khoogar hua insaan to mit jaata hai ranz
Mushqilein mujh par padi itani ki aasaan ho gai

तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हज़ार

Tum salaamat raho hazaar basas
Har baras ke hon din pachaas hazaar

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

Un ke dekh se jo aa jaati hai munh par raunak
Wo samjhte hain ki beemar ka haal achchha hai

वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं

Wo aaye ghar mein hamaare khuda ki kudarat hai
Kabhi ham un ko kabhi apne ghar ko dekhte hain

यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं
दुश्मन के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यूँ हो

Yahi hai aajmaana to sataana kis ko kehate hai
Adu ke ho liye jab tum to mera imtihan kyun ho

ये फ़ित्ना* आदमी की ख़ाना-वीरानी* को क्या कम है
हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उस का आसमाँ क्यूँ हो

Ye fitna aadmi ki khaana-veerani ko kya kan hai
Hue tum dost jis ke dushman us ka aasmaan kyun hon

ज़िंदगी में तो वो महफ़िल से उठा देते थे
देखूँ अब मर गए पर कौन उठाता है मुझे

Zindagi mein to wo mahfil se utha dete the
Dekhoon ab mar gaye par kaun uthata hai mujhe

तो दोस्तों महान शायर Mirza Ghalib के द्वारा लिखी यह शेरो शायरी आप लोगों को कैसी लगी, हमें उम्मीद है की Best Mirza Ghalib Shayari In Hindi ख़ास tarike se Ham Aap logo ke liye लेकर आये हैं Best Mirza Ghalib Shayari in Hindi 2 Lines वह आपको अच्छी लगी होगी, और आपको हमारा यह आर्टिकल कैसा लगा हमें कमेंट कर के जरूर लिखें, Thanks for Reading this article❤